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वसई विरार मनपा के पूर्व महापौर रूपेश जाधव का इस्तीफा सर्व साधारण सभा ने किया मंजूर,          महापौर पद से हटते ही रूपेश जाधव ने वसई सर्वधर्मी दफ़्नभुनी को लेकर दिया विरोधाभासी बयान रूपेश जाधव के बयान ने फिर मचाया तहलका

वसई विरार मनपा के पूर्व महापौर रूपेश जाधव का इस्तीफा सर्व साधारण सभा ने किया मंजूर महापौर पद से हटते ही रूपेश जाधव ने वसई सर्वधर्मी दफ़्नभुनी को लेकर दिया विरोधाभासी बयान रूपेश जाधव के बयान ने फिर मचाया तहलका

प्रवासी एकता/ यूसुफ अली

वसई, वसई विरार मनपा में महापौर पद से रूपेश जाधव ने त्यागपत्र एक पखवाड़े पूर्व ही दे दिया था लेकिन चूंकि महापौर पद एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और लोकतंत्र के हिसाब से एक जन प्रतिनिधि का त्यागपत्र उसकी अपनी लोकतांत्रिक संस्था में मंजूर होने के बाद ही सम्बन्धित व्यक्ति को पदमुक्त माना जाता है इसी के मद्देनजर 5 तारीख को मनपा ने विशेष महासभा बुलाई और महासभा में रूपेश जाधव के इस्तीफे पर चर्चा करते हुए इस्तीफे को मंजूर कर दिया गया इस्तीफे पे चर्चा से पूर्व कई नगरसेवकों ने रूपेश जाधव के कार्यकाल में उनके द्वारा किये गए कार्यो का उल्लेख किया अंत मे रूपेश जाधव ने भी महासभा में भावुक होकर अपने कार्यकाल में सभी को अपने द्वारा हरसंभव मदद करने का कहा वही अपने कार्यकाल के दौरान मनपा क्षेत्र में हुए विकास कार्यो में विशेष तौर पर मनपा में पेयजल आपूर्ति हेतु लाई गई अमृत योजना के साथ पिछले साल महाराष्ट्र साशन द्वारा 600 वर्गफुट से कम के घरों से खत्म किये गए शास्त्री कर को बताया चूंकि महासभा में चर्चा हेतु सिर्फ एक ही विषय था जो पूरा होने के पश्चात कुछ नगरसेवकों ने आयुक्त बी.जी.पंवार से विभिन्न सामान्य विषयो पे चर्चा करने का आग्रह किया और मनपा के प्रति अपने मन मे क्या है? को प्रकट करने का भी आग्रह किया तब आयुक्त ने कहा कि यहां आने से पूर्व में किसी भी मनपा में जाने का इच्छुक नही था में पहले भी विभिन्न मनपा में सेवाए दे चुका हूं तो अभी मुझे मनपा में आने की इच्छा नही थी लेकिन जिस दिन आदेश आया तो आना ही पड़ा और मेंने मनपा में अपना स्थान सम्भाल लिया यह मनपा दूसरी सबसे बड़ी मनपा है इस हिसाब से हमारी जिम्मेदारिया भी कई गुना बढ़ जाती है जिसे पूरा करने का हरसम्भव प्रयास किया जाता रहा है और आगे भी रहेगा आयुक्त के अपने विचारों के बाद नगरसेवकों ने कुछ और मुद्दों पर चर्चा की जिसमे एक नगरसेवक ने धारा 370 हटाये जाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आभार व्यक्त किये जाने का ठहराव पास करने की बात भी कही। अंत मे इसी चर्चा के दौरान पूर्व महापौर जो कि फिर से एक नगरसेवक रह गए ने बाकायदा पीठासीन अधिकारी की आज्ञा लेते हुए कुछ सूचना देने की बात कही जिसे मंजूरी मिलने के बाद रूपेश जाधव ने यह कहते हुए की पहले में जब पद पर था तो मेरे अधिकार में नही था कि में कोई सूचना महासभा को दे सकूं।

परन्तु अब में भी एक नगर सेवक रह गया हूं तो नगर सेवक की हैसियत से में यह कहना चाहूंगा कि जैसा कि आज के जमाने मे सोशल मीडिया का चलन काफी बढ़ गया है वही अखबारों में भी आये दिन कुछ न कुछ खबरे ऐसी छपती रहती है जो मनपा की छवि को धूमिल करती है आज महासभा से मेरा आग्रह है कि महासभा इसका संज्ञान ले और जूठे तरीके से मनपा को बदनाम करने वाले लोगो के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करे रूपेश जाधव इस वक्तव्य में वैसे कोई बुराई नही है जो उन्होंने कहा वो सही भी है बेवजह और बगेर सबूत के किसी भी संवेधानिक संस्था पर कोई आरोप लगाकर उस संस्था को बदनाम करना वाकई गलत है रूपेश जाधव का यह वक्तव्य तो ठीक है लेकिन रूपेश जाधव ने इस वक्तव्य के साथ जिस मामले का जिक्र किया उसमे खुद रूपेश जाधव ने गलत तथ्यों को पेश किया दरअसल रूपेश जाधव ने उदाहरण में वसई सर्वधर्मी दफ़्नभूमि का जिक्र करते हुए कहा कि दफ़्नभूमि को बांधने में सिर्फ ढाई करोड़ का खर्च हुआ और जो लोग इस मामले को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए आंदोलन कर रहे हैं उन्होंने 11 करोड़ बताकर मनपा की छवि खराब करने की कोशिश की।

रूपेश जाधव के इस वक्तव्य के बाद एक बार फिर सर्वधर्मी दफ़्नभूमि विवाद मामले में विरोधाभास का अहसास हुआ हमने भी इस मामले की गहनता से जांच पड़ताल की तो हमे मनपा पूर्व महापौर रूपेश जाधव पर हंसी आने लगी क्योंकि रूपेश जाधव ने दावा किया कि मनपा का ढाई करोड़ का ही खर्च हुआ है लेकिन हमें प्राप्त दस्तावेज में ठेका दिए जाने की प्रक्रिया का वर्णन है जिसमे में.जी.आर.कंस्ट्रक्शन नामक कंपनी को 4 करोड़ 14 लाख 77 हजार 752 रुपये दिखाया गया है सिर्फ यही रकम महापौर के दावों से ज्यादा है दूसरे एक दस्तावेज में वसई तहसीलदार कार्यालय ने वसई विरार मनपा को इसी दफ़्नभुमि की जमीन से बगेर रॉयल्टी चुकाए मिट्टी को चोरी छिपे ले जाने को लेकर 4 करोड़ 75 लाख 39 हजार 800 रुपये का दंड भरने का आदेश दिया था वही आगे उस निर्माणाधीन दीवार को फिर से तोड़े जाने में भी जाहिर है खर्च हुआ ही होगा इनके साथ इतने सालो से मनपा इस मामले को अदालत में झेल रही है जिसके लिए अत्यंत महंगे वकीलों की फीस हेतु भी मोटी रकम चुकाई गई।

रूपेश जाधव के इस बयान के बाद हमने फिर आंदोलनकारी किशन देव गुप्ता से बात की और किशन देव से जानना चाहा कि आखिर मामला है क्या?

तब किशनदेव गुप्ता ने विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि मेंने 2015 में ही इस मामले को उठाया था तब मुझे इस कार्य को संपादित करने हेतु दिए गए कार्यादेश पर आपत्ति थी दरअसल मनपा ने ऐसी ठेकेदार एक कंपनी को कार्य सौंपा जिसका लाइसेंस 3 महीने पहले ही समाप्त हो चुका था जो नियमानुसार गलत है जो अपने आप मे किसी भृष्टचार को दर्शाता है क्योंकि मनपा के इस कदम से यह सवाल उठता है कि क्या मनपा को कोई वेध लाइसेंस धारक ठेकेदार नही मिला? यह भी बतादे की कुल 3 ठेकेदारों ने निविदायें भरी थी और किसी भी ठेकेदार ने मनपा की अनुमानित लागत में कार्य न करते हुए कुछ प्रतिशत अधिक पर कार्य करने की निविदाएं दी थी जिसमे जी.आर.कंस्ट्रक्शन ने 5 प्रतिशत अधिक की मांग की थी जिसे मंजूरी भी मिली बाकी के दो में से एक नए 8 तो दूसरे ने 7 प्रतिशत बढ़ाये जाने की मांग की थी इसमे भी एक सवाल और यह भी आता है कि क्या मनपा प्रशासन को अपने अनुमानित लागत के हिसाब से निविदाएं प्राप्त नही हो पाई तो क्या निविदा प्रक्रिया को दोहराया नही जा सकता था? खैर यह मनपा प्रशासन का अपना अधिकार क्षेत्र है आगे किशनदेव गुप्ता ने अपनी बातों को बढ़ाते हुए कहा जब इस मुद्दे का मुझे कोई प्रतिउत्तर नही मिला तब बाद में मैने इसकी और भी अधिक जानकारी जुटाई जिसके लिए मेने बकायदा सूचना के अधिकार कानून का तक सहारा लिया और मेने कई बार मनपा से यह जानना चाहा कि जी. आर. कंस्ट्रक्शन को किस आधार पर अवैध लाइसेंस के ठेका दिया गया मेरे बार बार पूछे जाने पर भी मुझे कोई प्रतिउत्तर नही मिल पाया लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ा और आंदोलन का रूप ले लिया तब मनपा ने मुझे जी.आर.कंस्ट्रक्शन के लाइसेंस को मुद्दत वाढ मिलने का दस्तावेज उपलब्ध करवाया जो भी सन्देह जनक है पहला तो यह कि चाहे किसी भी कंपनी को मुद्दत वाढ दी गई हो लेकिन क्यों नही कार्यदेश में इसका उल्लेख ही किया गया? दुसरा सवाल जी.आर.कंस्ट्रक्शन को मुद्दत वाढ सिर्फ 180 दिन की मतलब 6 महीने की दी गई जबकि मनपा प्रशासन ने कार्य सम्पादित करने हेतु समय सीमा 9 महीने की दी तो यह सवाल भी है कि जब आपको पूर्व में ही मालूम है कि जिस कंपनी को आप ठेका देने जा रहे हो वह कंपनी स्थाई लाइसेंस धारक न होकर मुद्दत वाढ लाइसेंस धारक है जिसकी भी समय सीमा 6 महीने ही है जिसमे भी 3 महीने तो पहले ही पीछे चल रहे थे उस हिसाब से मुद्दत वाढ दिए गए लाइसेंस की वैधता सिर्फ 3 महीने ही बची थी जब कि कार्यदेश में 9 महीने में कार्य सम्पन्न किये जाने की शर्त थी तो ऐसी कंपनी का चयन क्यों किया गया? एक और पहलू हमारे सामने आया जो कि बेहद संगीन पहलू है दरअसल हमे जो दस्तावेज उपलब्ध करवाए गए जी.आर.कंस्ट्रक्शन के लाइसेंस की प्रति के रूप में उनमे अलग अलग दस्तावेजो में एक ही विभाग कार्यकारी अभियंता सार्वजनिक बांधकाम जव्हार की रबर मोहर जो इस्तेमाल की गई है में अंतर है जो अपने आप मे सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है और जिसकी उच्य स्तरीय जांच की जानी चाहिए रबर मोहर के आकार में ही नही बल्कि पूरे अंदर की लिखावट स्वरूप में हि फ़र्क है जो साफ देखा जा सकता है जो कि अत्यंत गम्भीर विषय है किसी भी विभाग की रबर मोहर को बिना प्रशासनिक अनुमति बदला नही जा सकता हा उस मोहर के खराब होने या नष्ट होने की सूरत में नया बनवाये जाने पर थोड़ा आकार में परिवर्तन हो सकता है लेकिन उस सूरत में भी अंदर जो लिखा गया है उसको बदला नही जा सकता। यह पूरा मामला अबतक सिर्फ पैसो के घोटाले का लग रहा था लेकिन अब इसमें कुछ और भी अलग घोटाला किये जाने का भी सन्देह पैदा होता दिख रहा है।

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