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“अपनी इन्द्रियों पर संयम रखना, व्यक्ति को साधना के पथ पर आगे बढ़ाने वाला होता है” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

“अपनी इन्द्रियों पर संयम रखना, व्यक्ति को साधना के पथ पर आगे बढ़ाने वाला होता है” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

“इन्द्रिय तथा मन के सुख बाधा सहित और क्षणिक होते है, आत्म सुख बाधा रहित और स्थायी होते है” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

संजय जैन

दिनांक – 4 अगस्त 2019, रविवार – कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) : ABTYP JTN BANGLOR, तेरापंथ धर्मसंघ मर्यादित धर्म संघ हैं, परम पावन आचार्य प्रवर इसकी सारणा – वारणा में पूरी तरह सजग अपनी अमृत देशना दे रहे है, जिसे पूरी तन्मयता से एवं एकाग्रता से श्रद्धालु जन आत्मसात करते हैं । गुरु दर्शन की राह में आने वाले हर प्राणी को मिलता हैं ऊर्जा का वर, मधुरता का कर, सत व्यवहार का घर और मन का ज्ञान आलोक भर । इसी ज्ञान को सुनने तुलसी महाप्रज्ञ चेतना केंद्र के परिसर मे खचाखच भरे प्रवचन पट्ट पर विराजित आचार्य श्री महाश्रमण जी सभी को सम्बोधित करते हुए फ़रमा रहे हैं कि हमारा शरीर तो तत्वों का योग हैं, शरीर नही केवल आत्मा वो सिद्ध है और जहाँ शरीर हैं, वहां आत्मा नही । इसलिए इन दोनो का योग हैं । ये दोनो नही तो मृत्यु । आत्मा की शरीर से मुक्ति मोक्ष । सम्बोधि के दूसरे अध्याय के इक्कीसवें श्लोक में मुनि मेघ भगवान महावीर से प्रश्न करता हैं कि ये इंद्रिया कौन सी हैं और उन इंद्रियों के विषय कौन से है और उनका निरोध कैसे ?

सम्बोधि की बात को पूज्यप्रवर अपनी चिरपरिचित सरल शैली में फ़रमा रहे हैं की इंद्रिया पाँच हैं स्पर्श, रस, गंध, रूप और श्रोत और सबके अपने विषय हैं, स्पर्श का स्पर्शन, रस का रसन, गंध का गुण, चक्षु का रूप और श्रोत का श्रवण सबका अपना विषय हैं, पर इन सबको ग्रहण करने वाला एक ही है ‘मन’ । जो सभी विषयों को ग्रहण करता हैं । कठिन काम हैं आसक्ति को रोकना पर विषयों में आसक्ति नही होनी चाहिए । ये एक साधना का विषय हैं । जीवन में इंद्रियों का बड़ा महत्व हैं। अगर ये सही से काम ना करे तो कान से सुनना बंद या कठिनाई । अरे कान से अच्छी वाणी सुनो गुरु की वाणी सुनो विकसित प्राणी हैं, मनुष्य दुरुपयोग ना करे इसका सदुपयोग भी हैं, अनावश्यक निंदा में समय लगना भौतिक जीवन जीते हैं टीवी भी देख रहे हैं, साथ-साथ नाश्ता भी, गाड़ी भी चला रहे साथ-साथ फ़ोन पे बातें, एक साथ दो-दो काम हानिकारक हैं।

इंद्रियों का दुरुपयोग नही करना चाहिए । दुनिया में कितने दृश्य हैं, सबको देखना अपेक्षित नही । आँखों से पुस्तक पढ़े । मास्क से सुगंध ज़्यादा नाहीं श्वास प्रेक्षा करे, शरीर से आराधना इस प्रकार बुरा सोचो मत, बुरा बोलो मत, ना बुरा सुनना और ना बुरा कहना। पूज्यप्रवर सभी को प्रेरणा दे रहे हैं कि संयम मन का बना रहे । मन में चंचलता ना रहे । दृष्टांत के माध्यम से भी समझाया कि भावना बहुत अच्छी चीज़ हैं पर मन को एकाग्र करे इंद्रियों पर संयम का प्रयास होना चाहिए ।

*उपस्थित धर्मसभा को पूज्यप्रवर ने विशेष आगाह किया एवं प्रेरणा दी की खाना खाते समय टीवी मोबाइल लेपटोप कम्प्यूटर आदी काम नही और गाड़ी चलाते समय फ़ोन पर बात नही।*

गुरुदेव ने अपने स्वरचित ‘महात्मा महाप्रज्ञ’ की जीवनी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बालक नथमल के मन में दीक्षा की तीव्र भावना थी पर उनके भाई मान नही रहे थे उनकी कई प्रकार से परीक्षा ली गयी और बालक नथमल के प्रतिउत्तर सुन अवाक रह गए। अंत में दीक्षा की स्वीकृति मिली और कालुगणी के दर्शन किए । वहाँ भी गुरुदेव ने परीक्षा ली और बोले एक जन अभी दीक्षा ले लो, एक को बाद में देंगे पर दोनो माँ बेटे ने साथ दीक्षा लेने की अर्ज़ की और वि सं १९८७ कार्तिक महीने में अष्टमाचार्य कालूगणी ने साधु प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति प्रदान की ।

गुरुदेव के सानिध्य में तपस्या का निरंतर क्रम चल रहा हैं । अनेकों मासखमण पखवाड़े आदि हो रहे हैं । समय समय पर गुरुदेव का प्रेरणा पाथेय भी मिल रहा हैं। आज धर्मपरिषद में मुनि अनेकांत कुमार जी ने भाइयों को और साध्वी सरलप्रभा जी ने बहनो को तपस्या से जुड़ने का आह्वान किया ।

साध्वीवर्या जी ने अपने वक्तव्य में शांत सुधारस ग्रंथ पर व्याख्यान के अंतर्गत मुल लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हेतु सम्यक् ज्ञान – दर्शन – चरित – तप को पुष्ट करने की प्रेरणा दी । शुद्ध भावों से इनका आचरण ही लक्ष्य प्राप्ति हैं । आचार्य श्री महाश्रमण जी की अनुत्तर समता भाव प्रेरणा दायक हैं। वेदना को सहन करते हैं, समता भाव को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।

अपने उद्धबोधन में साध्वीप्रमुखा जी ने फरमाया कि वर्तमान को भौतिकता प्रधान युग कहा गया हैं । लोगों का धर्म के प्रति आकर्षण कम हैं, पर महाश्रमण समवसरण की छटा निराली हैं, देखने लायक हैं । लोगों के मन में श्रद्धा हैं, जिज्ञासा हैं । इसलिए आध्यात्मिक वातावरण मिले प्रेरणा पाथेय मिले जिससे की जीवन में उर्धवारोहण कर सके । पूज्यप्रवर के अथक श्रम को नमन वे ऐसे यायावर हैं जो वे न केवल शेषकाल में अपितु चतुर्मास में भी भक्त को निराश नही करते । आज पूज्यप्रवर भी तपस्या के पारणे पर ८ km बाहर पधारे । संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया ।

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