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मैं क्या बोलूं

प्रवासी एकता/संजय जैन (मुम्बई)

विधा: कविता
शीर्षक: *मैं क्या बोलूं*
★★★★★★★★★

मैं क्या बोलूं, अपने बारे में।
क्योंकि खुद न जानू, अपने बारे में।
लोग बहुत कुछ, कहते है मेरे बारे में।
पर कभी कुछ बुरा नही, सुना अपने बारे में।।

दिल को अब,
कैसे हम समझाए ।
वो मानता ही नही है।
और न ही जनता है ।
बस नाम, तेरा ही लेता है,
तेरा ही लेता है ।।

यार करू तो क्या करूँ ।
जो अपनी दोस्ती,
अमर हो जाये।
कोई तो बात है,
हम दोनों में ।
जो हम लोग,
कह नही सकते ।
पर दिलों में,
मेहसूस करते है।
अब मैं क्या इसे बोलूं और क्या नाम दे
हम ।
खुद बता भी तो,
नही सकते यारो हम ।।

जब से तुमने,
अपना दोस्त बनाया है।
मेरी तो शैली,
ही बदल गई।
पहले लिखता था,
में कुछ भी।
अब तो सिर्फ तुम पर,
और,
तुम्हारी प्यारी दोस्ती
पर लिखता हूँ।
क्या नाम दू में इससे
अब ।
तुम खुद ही बता दो?
जो बात दिल में है,
उससे हमे बता दो।
तभी तो कुछ,
मैं बोलूंगा तुम को ।।

जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)

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