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भाजपा से हर हाल में हाथ मिलाना चाहेगी शिवसेना !! शिवसेना ने आदित्य को वर्ली सीट से मैदान में उतारा पहली बार ठाकरे परिवार का कोई नेता लड़ रहा है चुनाव शिवसेना कभी अपने दम पर नहीं बना सकी है सरकार

भाजपा से हर हाल में हाथ मिलाना चाहेगी शिवसेना !!

शिवसेना ने आदित्य को वर्ली सीट से मैदान में उतारा

पहली बार ठाकरे परिवार का कोई नेता लड़ रहा है चुनाव

शिवसेना कभी अपने दम पर नहीं बना सकी है सरकार

संजय जैन/प्रवासी एकता

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेता बालासाहेब ठाकरे ने 1966 में शिवसेना का गठन किया, बावजूद इसके आजीवन आक्रामक तेवर के साथ सियासत करने वाले बालासाहेब ने कभी चुनाव में हाथ नहीं आजमाया. शिवसेना ने बीजेपी के साथ हिस्सेदारी में महाराष्ट्र की सत्ता भी संभाली, मगर न कभी बालासाहेब और न ही उनके राजनीतिक वारिस उद्धव ठाकरे कभी सत्ता का हिस्सा बने. अब जुदा राजनीतिक हालात हैं और ऐसे में शिवसेना ने भी खुद को परंपरागत राजनीति से आगे बढ़ाते हुए गियर बदल दिया है.

ठाकरे परिवार के युवा चेहरे यानी आदित्य ठाकरे को चुनावी मैदान में उतार दिया गया है. यह पहला मौका है जब ठाकरे खानदान से कोई शख्स चुनाव लड़ने जा रहा है. ऐसे में इस बात की चर्चा भी जोरों पर है कि आखिर शिवसेना में यह बदलाव क्यों किया गया है.

रविवार (28 सितंबर) को मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने बताया कि उन्होंने बालासाहेब ठाकरे को जुबान दी थी कि एक दिन आएगा जब शिवसेना का मुख्यमंत्री होगा. उद्धव के इस बयान के अगले ही दिन शिवसेना ने उम्मीदवारों की जो सूची जारी की उसमें वर्ली सीट से आदित्य ठाकरे का नाम घोषित कर दिया गया. इससे साफ जाहिर है कि शिवसेना न सिर्फ बीजेपी के साथ गठबंधन में फ्रंट फुट पर खेलना चाहती है, बल्कि वह अपने परिवार के नए चेहरे को आगे रखकर राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाना चाहती है.माना ये भी जा रहा है कि शिवसेना की सहयोगी बीजेपी का महाराष्ट्र में लगातार मजबूत होता कद भी शिवसेना के लिए चिंता का सबब है. 2009 के विधानसभा चुनाव में महज 45 सीट जीतने वाली बीजेपी ने 2014 में अपने दम पर 122 सीटें जीतकर राज्य की राजनीति से कांग्रेस समेत एनसीपी, शिवसेना और मनसे जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को कमजोर कर दिया.

शिवसेना ने यह चुनाव बीजेपी से अलग होकर जरूर लड़ा, लेकिन नतीजों के बाद उद्धव ठाकरे ने मोदी से हाथ मिला लिया और बीजेपी ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बना दिया. हालांकि, इस पूरे कार्यकाल के दौरान फडणवीस कैबिनेट में मंत्रीपद संभालने वाले शिवसेना के नेता भी सरकार की आलोचना करते रहे. यहां तक कि उद्धव ठाकरे भी लगातार सरकार को आईना दिखाते रहे और दोनों पार्टियों के बीच खींचतान चलती रही. ऐसे में अब माना जा रहा है कि शिवसेना सरकार में बड़े दखल के साथ वापसी करना चाहती है.

सीट बंटवारे पर फंसी बात
बीजेपी-शिवसेना ने घमासान के बीच पांच साल कार्यकाल पूरा कर लिया है और अब महाराष्ट्र नए चुनाव के लिए तैयार है. हालांकि, अभी तक दोनों पार्टियों में सीटों का बंटवारा फाइनल नहीं हो पाया है. कहा ये भी जा रहा है कि शिवसेना, बीजेपी के साथ बराबर सीट बांटना चाहती है.

288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के पास 122 सीटें हैं, वहीं शिवसेना के पास 63 सीटें हैं. आईएएनएस की खबर के मुताबिक, बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे के ऐसे सूत्र पर समझौता चाहती है, जिसपर बीजेपी के पास 122 सीटें बनी रहें और शिवसेना पर उसके हिस्से की 63 सीटें रहें. जबकि बाकी सीटों में से कुछ सीटें रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) जैसे गठबंधन के छोटे दलों को देने के बाद आपस में बराबर बांट ली जाएं. एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि शिवसेना ने अपने लिए कम से कम 130 सीटें मांगी है.

हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि डिप्टी सीएम की सीट फिलहाल खाली है. इसके जवाब में शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा था, ‘ठाकरे उप पद नहीं लेते. परिवार का सदस्य हमेशा प्रमुख होता है. ठाकरे परिवार की राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रतिष्ठा है.’

महाराष्ट्र में बीजेपी का कद लगातार मजबूत

लोकसभा चुनाव के बाद बदले सियासी समीकरण में बीजेपी का ग्राफ तेजी से मजबूत हुआ. इस बात का आभास शिवसेना को भी है. इसलिए शिवसेना रणनीति के साथ अपने कदम बढ़ा रही है. आदित्य ठाकरे ने महाराष्ट्र में अपने कद को बढ़ाने के लिए जन आशीर्वाद यात्रा निकाली थी, जो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की महा जनादेश यात्रा के सामांतर मानी जा रही थी.

अपने दम पर नहीं बना सकी सरकार

क्षेत्रीय पार्टी के रूप में डीएमके, एआईएडीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआर, टीआरएस, टीएमसी, पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, जेडीयू, आरजेडी जैसे तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप अपने दम पर अपने-अपने राज्यों में सरकार बनाते रहे हैं. लेकिन शिवसेना के 52 साल के इतिहास में ऐसा कोई मौका नहीं आया है जब वो अपने दम पर सरकार बना सकी हो. यहां तक कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो 2014 में शिवसेना को 63, 2009 में 45 और 2004 में 62 सीटें मिली थीं. ऐसे में अब जबकि राज्य में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली दो पार्टियां कांग्रेस और एनसीपी लगातार कमजोर हो रही है तो शिवसेना जरूर इस खाली जगह को भरना चाहेगी

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