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साध्वी पंकज श्री लाडनूं

प्रवासी एकता टीम

बरसता बादल रिमझिम सावन की दस्तक दे रहा है। आ गई अंधकार को प्रकाशमय बनाने वाली गुरु पूर्णिमा जिसे” व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं “। यह आषाढ़ी पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है। भारत देश ऋषि मुनियो का प्रधान देश है। इस धरती पर अनेक महान गुरू अवतरित हुए हैं। गुरु पूरे संसार को प्रकाशित करने वाले होते हैं। गुरु शब्द का अर्थ इस प्रकार किया जाता है-गु+रु =गुरु का अर्थ है अंधकार और रू का अर्थ है प्रकाश में लाना अत: तम से रोशनी में लाने वाली शक्ति का नाम है गुरु‌ । अज्ञान रूपी अंधेरी राह को दूर कर सम्यक् उजाला देने वाले महासूर्य है गुरु। श्रमण संस्कृति व वैदिक संस्कृति का प्राण तत्व है गुरु । गुरु पूर्णिमा से जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ बहूत संबंध रखता है। ऐसे तो आषाढ़ी पूर्णिमा जैन दर्शन के अनुसार चतुर्मास की स्थापना का पवित्र दिन है। यह दिन जैन साधु के भ्रमणशील जीवन में स्थिरता का सूचक है। लेकिन यह दिन तेरापंथं स्थापना दिवस का ध्वजारोहण का पवित्र day है । आज के दिन ही क्रांतिकारी वीर भिक्षु ने तेरापंथ धर्म संघ की स्थापना की।
खुदा है गुरु- जैन वैदिक एवं सभी परंपराओं में गुरु महिमा सर्वोपरि रही है। जैन दर्शन में कहा गया है- तित्थयर समोसुरी “आचार्य तीर्थंकर के समान होते हैं ।शास्त्रकारो ने भी लिखा है –

ध्यानमुलं गुरोर्मूर्ति:, पुजामूलं गुरो पदम् ।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरो: कृपा ।।

गुरु की मूर्ति ही ध्यान का मूल है -गुरु के पादार विंद पूजा के मूल है ।गुरु के आशीर्वचन ही मूल मंत्र है ,गुरु कृपा ही मोक्ष का मूल है ।बंधुओं जिन्होंने गुरु कृपा पाली उन्होंने खुदा को पा लिया और संसार के सब दु:खों का अंत कर दिया।

कर्ता है गुरु – संसार में मनुष्य कुछ करें या न करें लेकिन गुरु चाहे तो सब कुछ हो सकता है। बहुत ही सुंदर कहा गया -कर्ता करे या ना करें गुरु करे सो होय।
गुरु भक्ति रस में स्वयं आचार्य श्री तुलसी लिखते हैं –

हर कठिन समस्या का हल गुरु की आस्था,
दिग्र्भान्त मनुज को मिल जाता है रास्ता ।
गुरुदेव द्वीप है शरण प्रतिष्ठा गति है,
गुरु दृष्टि जगत में सबसे बड़ी प्रगति है।।

वास्तव में गुरु का आदेश निर्देश व पथदर्शन ही शिष्य के लिए मंगलकारी व कल्याणकारी सिद्ध होता है। गुरु तारण- तरण जहाज है ।गुरु ही आधार है ।गुरु ही शरण है।जिस शिष्य को कृपा रुपी छतरी मिल जाती है फिर भला कौन है ?जो उसका बाल बांका कर सके?

गोविंद ही है गुरु- गुरु महिमा मैं संत कबीर का हृदय झंकृत हो उठा-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े ,काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु देव की, गोविन्द दियो बताय।।

मेरे सामने भगवान् व गुरु खड़े हैं ,मैं सबसे पहले किसको प्रणाम करूं? इस प्रशन कुंडली में कबीर ने” गुरु घर “को सर्वोत्तम स्थान देते हुए कहा मैं पहले गुरु को प्रणाम करता हूं जिन्होंने मुझे हरि तक पहुंचा दिया। गुरु पारसमणी है जो लोहे को अपने सम्मान बना लेती है सोना बना देती है। इसलिए आगे बढ़ते हुए कहते हैं “हरि रूठे गुरु ठोर है गुरु रूठे नहीं ठोर”। अगर भगवान रूठते हैं तो गुरू उन्हें मनाने का रास्ता दिखा देते हैं लेकिन यदि गुरु रूठ जाए तो शिष्य का क्या ठिकाना है, कौनसा दर है ?उसके लिए जहां से वे रोशनी की मांग कर सके।
बंधुओं ! गुरु कृपा तो श्रद्धा विवेक से ही प्राप्त हो सकती है आज गुरु पूर्णिमा आई है गुरु धारणा अवश्य करें ।कहा गया- “जिसकें जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं “।सर्वशक्तिमान केंद्र है गुरु जहां सभी शक्तियां प्राप्त होती है ।
त्रिक् है गुरु – ‌ भारतीय संस्कृति में त्रिक् का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रकृति के तीन गुण सत्व ,रज:, तम: । तीन लोक सूरलोक, पाताल लोक ,मनुष्य लोक। जैन दर्शन में द्रव्य के तीन रूप -उत्पाद ,व्यय,ध्रोव्य । ज्ञान ,दर्शन ,चारित्र। देव, गुरु ,धर्म। वैदिक परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु ,महेश तीनों का स्वरुप एक गुरु में ही समाहित है। जैन दर्शन में देव, गुरु ,धर्म के मध्य में विराजने वाले गुरु ही तीर्थंकर देव है और सद् धर्म का बोध कराने वाले भी गुरु ही है । गुरु को तीन उपमाओ से उपमित किया गया है।

1) कुम्भकार (2)माली (3) शिल्पकार
(1) कुम्भकार – जैसे कुंभकार मिट्टी को चाक पर चढ़ाकर अंदर हाथ रखकर ऊपर से हाथ की चोट से गिल्ली मिट्टी के लोंदे को घड़े का रूप देता है। वैसे ही गुरु मधुर अनुशासन की चोट से शिष्य रूपी घड़े का निर्माण करते हैं।
(2) माली – ‌ जिस प्रकार माली नन्हें पौधों को सिंचन देकर फल ,फूल और छाया देने के काबिल बना देता है ।वैसे ही गुरु शिष्य को ज्ञान, दर्शन , चारित्र के द्वारा आत्म दर्शन के योग्य बना देता है।
(3) शिल्पकार- ‌‌ तीसरा रूप है गुरु का शिल्पकार जो अनगढ़ पत्थर को तराशकर मूर्ति का रूप देकर पूजनीय बना देता है ठीक है वैसे ही शिल्पकार गुरु शिष्य रूपी कंकर को शंकर बना देते हैं।

आज अपेक्षा है सच्चे गुरु की। गुरुओं की लंबी कतार में गुरु किसे बनाया जाए? अध्यात्म की ज्योति जलाने के लिए कंचन व कामणी का त्यागी संत ही गुरु हो सकता है। ऐसे महान गुरु ही सम्यक रूपी लक्ष्मी का वरदान दे सकते हैं। ऐसे गुरु ही मल्लाह बनकर भव सिंधु पार लगा सकते हैं। एक कहानी के माध्यम से जाने सच्चे गुरु ही सही रास्ता दिखा सकते हैं। एक बार पंडित जी के घर एक तोता रहता था। पंडित जी घर में रामायण कथा करते और कहते “राम नाम से बंधन टूटे ।”पिंजरे में बंदी तोता निरंतर यह पाठ सुनता! वह सोचता मेरे बंधन क्यों नहीं टूटते? मैं राम का नाम लेता हूं पंडित मुझे मुक्त नहीं करता। जब भी पंडित कहता “राम नाम से बंधन टूटे”तोता छटपटाता और बोलता “पुस्तक पन्ने पंडित झूठे”। पंडित को गुस्सा आता पर मूक प्राणी समझकर वह मौन रहता। एक दिन एक अनुभवी महात्मा आये, कथा वाचन हुआ तोते ने फिर वही बात दोहराई “पुस्तक पन्ने पंडित झूठे”। महात्मा जी समझ गये उन्होंने कथा में ” भेदविज्ञान,कायोत्सर्ग ” का प्रयोग बताया । तोते ने प्रयोग किया। गर्दन नीचे गिरा दी।मृतवत् लेट गया ।दूसरे दिन पंडित दाना डालने आया तो देखा तोता मरा पड़ा है ।उसे बाहर फेंक दिया । तोता उड़ गया ।पंडित देखता ही रह गया। पंडित बोला “राम नाम से बंधन टूटे “तोता बोला नहीं “सुगुरु मिले तो बंधन टूटे “। यह द्रष्टान्त हमें सुगुरु की प्रेरणा देता है। आषाढ़ी पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के दिन सम्यक् आचरण के लिए सच्चे गुरु की शरण स्वीकार करें। हम सौभाग्यशाली हैं हमें कंचन -कामिनी के त्यागी वीर भिक्षु आज के दिन प्राप्त हुए। जिन्होंने कहां- त्याग में धर्म है ,भोग में नहीं। संयम धर्म है- असंयम धर्म नहीं है। हृदय परिवर्तन में धर्म है बलजबरी में धर्म नहीं। दया में धर्म है हिंसा में नहीं। ऐसे महामना गुरु भीक्षु के श्री चरणों में नतमस्तक होती हुई अपने को खुश किस्मत मानती हूं कि आज भी उसी चमन के माली महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की शासना में संयम के राजमार्ग पर चित समाधि की बुलंदियों को छू रही हूं ।यह है गुरु की अमृतमय देशना।

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