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सभी की आत्मा को अपने समान समझे-आचार्य महाश्रमण

सभी की आत्मा को अपने समान समझे-आचार्य महाश्रमण

जैन धर्म के सिद्धान्त ‘आत्मतुला’ का आचार्यवर ने किया विवेचन
रतलाम से विधायक चैतन्य कश्यप पहुंचे दर्शनार्थ

रवि जैन प्रवासी एकता चीफ ब्यूरो

06 सितंबर 2019 गुरुवार, कुंबलगोडू बेंगलुरु, कर्नाटक।

अहिंसा यात्रा द्वारा कोलकाता से लेकर कन्याकुमारी तक सद्भावना, नैतिकता एवं नशामुक्ति की अलख जगाने वाले अहिंसा यात्रा प्रणेता शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी का आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ चेतना केंद्र में चातुर्मास सानंद प्रवर्धमान है। पर्युषण महापर्व के उपरांत भी बड़ी संख्या मे देश के कई क्षेत्रों से श्रद्धालु संघ रूप मे धर्माराधना हेतु श्री चरणों मे पहुँच रहे है।

महाश्रमण समवसरण मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि – हमें अनित्यता का बोध होना चाहिए। इस नश्वर संसार मे सब अनित्य है। केवल आत्मा है जो शाश्वत है। सदा हमारे साथ रहती है। जैन दर्शन में एक सिद्धान्त है – आत्मतुला यानी सबकी आत्मा को समान समझना चाहिए। कर्मो के द्वारा आत्मा के आवरण मे भिन्नता हो सकती है परंतु आत्मा का स्वरूप एक है।

आचार्यवर ने आगे कहा – संसारी सभी आत्माओं को सुख प्रिय होता है व दुख अप्रिय होता है । अगर मनुष्य सभी को समान समझे तो किसी को दुख नहीं दे सकता । जहां अहिंसा होती है वहीं शुध्द्ता है, धर्म है। हमे किसी के प्रति अनिष्ट का भाव नहीं रखकर कल्याण की भावना रखनी चाहिए। हिंसा – वैमन्स्य के कारण , आत्मा मलिन हो जाती है । आचार्यप्रवर ने संबोधि के द्वारा प्रेरणा प्रदान की एवं “महात्मा महाप्रज्ञ” का वाचन किया।
आज कार्यक्रम में रतलाम के विधायक एवं क्रिडा भारती के राष्ट्रिय अध्यक्ष चैतन्य कश्यप ने शांतिदुत के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं अपने उद्गार व्यक्त किए ।

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