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“देश परिवर्तन हो, वेश परिवर्तन हो, परिवेश परिवर्तन भी हो लेकिन संस्कार परिवर्तन नहीं होना चाहिए” -आचार्य श्री महाश्रमण जी,प्रवासी भारतीय सम्मेलन का आगाज…..

“जीवन मे चित्त समाधि बनी रहे” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

“देश परिवर्तन हो, वेश परिवर्तन हो, परिवेश परिवर्तन भी हो लेकिन संस्कार परिवर्तन नहीं होना चाहिए” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

“मनुष्य जनम दुर्लभ है, सम्यक़्तव तत्व जीवन मे बना रहे हे, चारित्र शुद्धि रहे” – मुख्य मुनि प्रवर

प्रवासी भारतीय सम्मेलन का आगाज…..

संजय जैन

दिनांक – 3 अगस्त 2019, शनिवार – कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) : ABTYP JTN BANGLOR, आचार्य महाश्रमण जी के सानिध्य में तुलसी महाप्रज्ञ चेतना केंद्र परिसर की आभा – सुषमा अलौकिक नज़र आ रही हैं। गुरु के सानिध्य में सात समंदर पार से भक्त आज महाश्रमण समवसरण में संबोध लेने आए हैं । पूज्यप्रवर ने फ़रमाया कि आदमी के मन में समाधि प्राप्त करने की इच्छा रहती है, जीवन में चित्त समाधि रहे । सम्बोधि के दूसरे अध्याय के अठारहवे श्लोक में भी यह शिक्षा दी गयी हैं कि समाधि प्राप्त करने के उपाय है पर आधी व्याधि उपाधि से समाधि में बाधा आ सकती हैं। शरीर बीमारियों का घर हैं कब कौनसी बीमारी आ जाए ये कहा नही जा सकता, यह तो समाधि में स्थूल बाधा हैं । आधि यानी मानसिक बीमारियाँ मन में पीड़ा हैं तो भी समाधि नही और उपाधि यानि भावनात्मक बीमारी घृणा द्वेष इस से भी समाधि भंग होती हैं । आधि व्याधि तो ठीक हो जाए पर उपाधि मूल बीमारी हैं।

सम्बोधि में बताया गया है मोह उन्मूलन के बारे में, उसके उपाय के बारे में, समाधि की प्राप्ति तभी जब मोह का उन्मूलन और उसका उपाय समता की साधना । आँख कान नाक का स्पर्श ये मनोज्ञ अमनोज्ञ के शब्द हैं, जो अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना असर दिखाते हैं, मनुष्य को ख़ुशी में ज़्यादा राग नही और दुःख में अतिद्वेष नही करना चाहिए। अमनोज्ञ प्रतिकूल हैं या अनुकूल हैं, पर राग द्वेष नही और मनोज्ञ भौतिक पदार्थों में द्वेष नही पूर्ण समता। वह वीतराग कहलाता हैं, जो सम्पूर्ण समाधि प्राप्त करे। यानि लाभ-अलाभ में सम रहना। सुख दुःख में सम, मौत आए तो डरे नही, मौत से मैत्री । निंदा प्रशंसा में शांति आलोचना का जवाब नही । पूज्य प्रवर ने निंदा आलोचना पर प्रहार ना कर शांति समता रखने की प्रेरणा दी । मान अपमान में भी शांति । जीवन की अनुकूलता प्रतिकूलता में मानसिक संतुलन । एक दृष्टांत के माध्यम से पूज्य प्रवर ने अति सरल भाषा में इस बात को समझाते हुए सभी को प्रेरणा दी कि आपदा और सम्पदा दोनो मौसेरी बहने हैं। पर जीवन में कोई भी आए न । न राजा सम्पदा में आसक्त रहना है, न ब्राह्मण आपदा में, तो आपदा-सम्पदा में समता में रहे । ग़ुस्से आवेग पर संतुलन रहे, यही समाधि का उपाय हैं।

‘महात्मा महाप्रज्ञ’ आख्यान में आज गुरुदेव ने आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन वृत पर आधरित घटनाओं का उल्लेख कर उनके जीवन में दीक्षा के भाव एवं माँ बालूजी की भी तीव्र दीक्षा भावना का वर्णन पूज्यप्रवर ने किया ।आज तेरापंथ इतिहास में पहली बार NRI तेरापंथ सम्मेलन हुआ, जिसमें सैंकड़ों तेरापंथ NRI गुरु चरणों में पहुँचे । पूज्य प्रवर ने उन सबको प्रेरणा पाथेय प्रदान किया कि विदेश प्रवासी भारतीय सम्मेलन में सभी का आना एक अच्छी बात हैं । मातृभूमि को छोड़ कर विदेश की धरती पर शिक्षा उपार्जन करने या अर्थोपार्जन अथवा और भी कोई उद्देश्य से विदेश गए हो, देश की नागरिकता भी प्राप्त की हैं । तो देश परिवर्तन, वेश परिवर्तन, परिवेश परिवर्तन भले हो पर संस्कार परिवर्तन नही आना चाहिए। अपने मूल्यों के प्रति जागरुक रहे । अपना सम्यक् दर्शन पुष्ट रहना चाहिये । आज आप यहाँ अपने संस्कारों को देव गुरु व धर्म से कनेक्ट करने का सलक्ष्य प्रयास करे । भारतीय विदेश प्रवासी सम्मेलन में ज़्यादा से ज़्यादा आध्यात्मिक खुराक का कलेक्शन हों । अच्छे संस्कारों से कनेक्ट होने की पावन प्रेरणा दी।

मुख्य मुनि प्रवर ने NRI सम्मेलन में पधारे सभी प्रवासियों को प्रेरणा दी कि चरित्र निष्ठ रहे।मनुष्य जन्म दुर्लभ हैं जीवन में धर्म का आचरण रहे । अपने देव अरिहंत भगवान गुरु आचार्य श्री महाश्रमण जी एवं तेरापंथ धर्म संघ पर पूर्ण श्रद्धा निष्ठा रहे। बुरी आदतों से बचे, श्रद्धा मज़बूत रहे, धर्म के आचरण से हमारी आत्मा पवित्र रहे । वर्तमान के साथ-साथ भविष्य भी सफल उज्ज्वल रहे ।
NRI कनेक्ट समिट के संयोजक सुरेंद्रजी पटावरी ने अपने ३५७ दिन के इंतज़ार बाद आए इस पल की ख़ुशी का इजहार करते हुए गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की, जिनकी पावन प्रेरणा से विदेशी भारतीय सम्मेलन की परिकल्पना साकार हुई । संस्था शिरोमणी महासभा के महामंत्री विनोद जी बैद ने अपने विचार रखे।महासभा को आशीर्वाद प्रदान करते हुए पूज्य प्रवर ने फ़रमाया की महासभा तेरापंथ समाज की माँ हैं और माँ का काम बच्चों की देखभाल करना, उन्हें धार्मिक पोषण मिले, वे धर्म की दिशा में आगे बढ़ते रहे, उन्हें ज्ञान मिले, शिक्षा मिले, संस्कार मिले । पूज्यप्रवर ने सभी NRI को सम्यक़्तव दीक्षा प्रदान की एवं उन्हें नशामुक्त जीवन जीने की शाकाहारी रहने की प्रेरणा दी ।

आज पूज्य प्रवर के सानिध्य में बेंगलोर में प्रवासित श्री आऊवा जैन महिला मंडल की बहने आयी जिसमें लगभग मंदिर मार्गी सदस्य हैं, दर्शन एवं सेवा का लाभ लिया । तपस्या के प्रत्याख्यान हुए JTN की सदस्या बिंदु जी रायसोनी ने १३ की तपस्या के प्रत्याख्यान किए । संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया ।

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