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“दुःख का मूल कारण हमारे भीतर की कामना की वृद्धि और भोग : लालसा की वृद्धि”-आचार्य श्री महाश्रमण जी

“दुःख का मूल कारण हमारे भीतर की कामना की वृद्धि और भोग : लालसा की वृद्धि” – आचार्य श्री महाश्रमण जी

“वीतरागता की साधना जीवन का लक्ष्य बने”

जयपुर से संघ दर्शनार्थ उपस्थित

गणमान्य लोगों ने दर्शन कर धन्यता का अनुभव किया

संजय जैन

दिनांक – 2 अगस्त 2019, शुक्रवार – कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) : ABTYP JTNBANGLOR, महाश्रमण समवसरण के पवित्र प्रांगण में पवित्र विचारों एवं पवित्र भावों से पूज्यप्रवर के सानिध्य में सभी श्रद्धालुओं में पवित्रता का संचार हो रहा हैं । आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ चेतना केंद्र परिसर में महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी के अंतर्गत पवित्र ग्रंथ सम्बोधि में समाहित सोलह अध्याय के दूसरे अध्याय का वाचन हो रहा हैं, तो अठारहवें श्लोक में बताया गया कि आदमी के भीतर अनेक वृत्तियाँ होती हैं, आदमी अनेक विचारों वाला,भावों वाला होता हैं तो कभी-कभी आवेश का भाव, अहंकार का नाग, कभी माया की वृत्ति, कभी लालसा की कामना का भाव, तो कभी क्षमाशील या संतोषी के भी भाव मन के पट पर उभरते हैं, मन की स्थिति हैं क्योंकि मन चंचल भी हैं और मन विकृति पूर्ण हैं । इसमें एक लोभ की वृति, आसक्ति की वृत्ति चाह लालसा पैदा होती हैं । योग्यता कम और इच्छा ज़्यादा ये कैसे होगा । योग्यता के अनुरूप हैं तो ठीक, नही तो विसंगति । तो हमें योग्यता के आधार पर कुछ प्राप्त करना चाहिए । येन-केन प्रकारेण कुछ पाने से यानी छोटी चीज़ पाने की चाहत में बड़ी चीज़ हम खो देते हैं । पूज्यप्रवर ने इस सीख को दृष्टांत द्वारा इतने सरल माध्यम से समझाया कि महात्मा के मन में अपने उत्तराधिकारी को लेकर कई बार चिंता होती हैं और वे कसौटी भी लेते हैं, पर शिष्य को भी गुरु आज्ञा में रहना चाहिए और जो गुरु दे वह प्राप्त करना चाहिए।न की कोई माँग करनी चाहिए । गुरु ने शिष्य को पाठ सुनाने हेतु कहा और शिष्य के मन मे पाठ करते करते गुरु को भेंट में आए नीले घोड़े पर विचलित हो गया और पाठ बीच मे अधूरा छोड़ घोड़े की माँग कर दी । गुरु ने उसे घोड़ा तो दे दिया पर उत्तराधिकारी के पद से वंचित कर दिया ।

तात्पर्य यह हैं की आदमी छोटी चीज़ में उलझ जाए तो बड़ी चीज़ से वंचित रह सकता हैं ।
सम्बोधि की बात को आगे बढ़ाते हुए पूज्यप्रवर ने भगवान महावीर और मुनि मेघ द्वारा किए प्रश्नो की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि दुःख क्यों पैदा होता हैं..? दुनिया में दुःख ही दुःख हैं, दुःख का मूल कारण हमारे भीतर कामना की वृद्धी भोग – लालसा जिससे देवता भी दुखी और इंसान भी । दुःख शारीरिक भी और मानसिक भी । और इस दुःख का अंत वही प्राप्त कर सकता हैं, जिसने राग द्वेष को कम किया हैं । वीतराग व्यक्ति दुःख का अंत प्राप्त कर सकता है ।राग द्वेष रहित वीतराग को दुःख सता नही सकते । दुःख का समापन वीतरागता प्राप्त होने के बाद हो जाता हैं तो हम वीतरागता की दिशा में आगे बधे । पंचम काल में मुश्किल हैं, वीतराग बनना । इस भरत क्षेत्र में कोई केवलज्ञानी नही बन सकता, पर इस दिशा में गतिमान बने । हमारी लालसा कामना इच्छा कम बने, अवैद्य दृष्टि से अर्थ उपार्जन न कर, न्याय नैतिकता की शुद्धि से शुद्ध पैसा अर्जन घर में आए। अपने कार्य में ईमानदारी से संकल्पों की दिशा में आगे बढ़े । सम्पूर्ण सफलता ना मिले पर उसे पाने का प्रयास करे । निराश ना हो वैसे भी हर असफ़लता हमें सफलता के क्षेत्र की दिशा में आगे बढ़ा सकती हैं । और राग द्वेष के भाव क्षीण करती हैं। इसका एक अचूक बाण प्रेक्षाध्यान पद्दत्ति में श्रद्धेय आचार्य महाप्रज्ञ जी ने बताया कि प्रियता अप्रियता को देखे। तो कुछ-कुछ सीढ़ियाँ इस और बढ़ती रहे । ऐसा प्रयास होना चाहिए।

जयपुर के लोकसभा सांसद रामचरण जी बोहरा आज पूज्यप्रवर की सन्निधि में उपस्थित हुए और उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से निवेदन किया कि गुरुदेव के मंगल वचन सुने और इन्हें जीवन में उतारे तो व्यक्ति कभी दुखी नही हो सकता । आपके दर्शन कर में एक साल की खुराक यहाँ से लेकर जा रहा हूँ।
न्याय जगत के व्यक्तित्व – जसटीस एन के जैन भी आये और उन्होंने कहा कि आचार्यश्री के दर्शन की बड़ी लगन थी जो आज पूरी हुई है । 2008 में युवाचार्य के समय प्रथम बार दर्शन किए फिर उसके बाद प्रतिवर्ष निरंतर कर रहा हूँ । गुरु सन्निधि में मन प्रफुल्लित हो गया मन को मिल रही शांति का वर्णन नही कर सकता।एक समय तक खाने के बाद नियम आज भी निभा रहा हु।जयपुर निवासी नरेश जी मेहता भी उपस्थित रहे और अपने विचार रखे ।
105 सदस्यों का जयपूर से संघ गुरु सानिध्य में पहुँचा ।प्रारम्भ में साध्वीवर्या जी ने शांत सुधारस में बारह भावना पर व्याख्यान देते हुए विषय मोह का नाश समता भाव मे लीन के बारे में बतलाया । मुनिश्री दिनेशकुमार जी ने संचालन किया ।

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